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बीए सेमेस्टर-3 चित्रकला प्रथम प्रश्नपत्र

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2022
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2676
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-3 चित्रकला प्रथम प्रश्नपत्र

प्रश्न- कांस्य कला (Bronze Art) के विषय में आप क्या जानते हैं? बताइये।

उत्तर - 

कांस्य कला
(Bronze Art)

ढलवाँ धातु की मूर्तियों के लिए कांस्य सर्वाधिक लोकप्रिय प्रयुक्त धातु है। काँसे की कुछ विशेषतायें हैं जो इसे ढलाई के लिये सर्वाधिक उपयुक्त बना देती है। सेट होने के ठीक पहले काँसा थोड़ा फैलता है, जिससे मूर्ति आदि के बारीक स्थान भर जाते हैं। तत्पश्चात् काँसा जब ठंडा होता है यह थोड़ा-सा सिकुड़ता है जिससे इसे मोल्ड से अलग करना आसान हो जाता है। कांस्य मिश्र धातु अनेक हैं आजकल केवल कांस्य कहने से कोई विशेष अर्थ नहीं निकलता। आजकल कांस्य के स्थान पर ताम्र मिश्रातु (कॉपर एलॉय) कहा जाने लगा है। आधुनिक काँसा प्रायः 88% ताँबा तथा 12% टिन होता है। काँसा बनाना मनुष्य ने कैसे सीखा यह कहना कठिन है। कदाचित ताँबा गलाने के समय उसके साथ मिली हुई खोट के गल जाने के कारण यह अकस्मात् बन गया होगा क्योंकि काँसे की वस्तुएँ तो सुमेर, मिस्र, ईरान, भारत, चीन के प्रागैतिहासिक युग के सभी स्थानों से प्राप्त हुई है। परन्तु इन सभी स्थानों के उस प्राचीन युग के है। काँसे की मूल विविध धातुओं के परिणाम में अन्तर है। जैसे भारत के एक प्रकार के काँसे में ताँबा 93.5 भाग, जस्ता 2.14, निकेल 4.80 भाग तथा आरसेनिक मिला है एवं दूसरी भाँति के काँसे में टिन, सुमेर, ईरान इत्यादि के स्थानों की भाँति प्राप्त हुआ है। इस मिली हुई धातु से कारीगरी को वस्तुओं को ढालने में बड़ी सरलता हुई तथा इस मिश्रित धातु की बनी कुल्हाड़ी खाली ताँबे की बनी कुल्हाड़ी से कहीं अधिक धारदार तथा कड़ी बनी है। ऐसा अनुमान होता है कि इस धातु के कारीगरों का अपना एक जत्था प्रागैतिहासिक युग में बन गया जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपने धंधे का प्रचार करता था। पाषाण की बनी हुई कुल्हाड़ियाँ इन काँसे की कुल्हाड़ियों के सामने फीकी पड़ गई। इन्होंने इसी धातु से प्रागैतिहासिक पशु आकृतियाँ भी बनाई। 

इन्हीं कारीगरों ने कुल्हाड़ी बनाते समय चमकते हुए आभूषण भी बनाने प्रारम्भ किए जिनके सबसे उत्कृष्ट युग के नमूने हमें जूड़े के काँटों के रूप में हड़प्पा, मोहन जोदड़ो, चान्हूदड़ो, हिसार, सूसा, सियाल्क, चीन, कीश, ऊर तथा मिस्र से मिले हैं। अँगूठियाँ भी इस धातु की बहुत सुन्दर बनी हुई मिली हैं। लूरिस्तान की बनी एक अँगूठी के ऊपर तो बड़े ही सुन्दर पशु अंकित हैं। काँसे को जब कारीगर गलाकर ढालने लगे तो इन्होंने विविध आकृतियाँ भी बनानी प्रारम्भ कीं। जूड़े के काँटों के मस्तक पर ऊँट, हिसार से प्राप्त काँटे पर हँस, छागर बाज़ार से प्राप्त काँटे पर बन्दर इत्यादि। काँसे की इसके पश्चात् बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ भी बनने लगीं। इसमें सबसे प्रमुख तो इस काल के सुमेर के अन्निपाद के गौ देवी के मन्दिर के चबूतरे पर बने दो साँड़ तथा एक सिंह के मुख की चील है जो अपने पंजों में सिंह के दो बच्चों को पकड़े हुए हैं। साँड़ों के शरीरों पर तिपतिया की उभारदार आकृतियाँ बनी हैं। मोहन जोदड़ो से प्राप्त काँसे की एक ठोस स्त्री- मूर्ति भी दर्शनीय है। इस काल में प्रायः मूर्तियाँ ढालकर बनाई जाती थीं। प्रागैतिहासिक युग में काँसे के कारीगरों ने छोटी गाड़ियाँ भी बनाई जो खिलौनों भाँति व्यवहार में आती थीं। इस प्रकार की एक बड़ी सुन्दर गाड़ी जिस पर उसको चलाने वाला भी बैठा है हमें हड़प्पा से प्राप्त हुई है। काँसे पर उभारदार काम की वस्तुएँ सबसे अच्छी लूरिस्तान से प्राप्त हुई हैं जिसमें एक तरकश पर बना काम उत्कृष्ट कोटि का है। काँसे के बर्तन भी इस समय बने। ये बरतन ईरान, सुमेर, मिस्र तथा भारत के मोहन जोदड़ो, हड़प्पा तथा लोथल से प्राप्त हुये हैं। ये भी प्रायः ढालकर या पत्तर को पीटकर बनाये जाते थे। इन पर पीछे उभारदार काम भी दृष्टव्य है जो कदाचित् मिट्टी पर काम बनाकर उस पर पत्तर रखकर पीटकर बनता था। पीछे इन मिश्रित धातु की विविध वस्तुएँ बनीं। भारत में भी तक्षशिला से कटोरी के आकार के मसीह पात्र प्राप्त हुए हैं। जिन पर ढक्कन लगा हुआ है तथा जिसमें कमल से स्याही लेने के लिये छेद बना है। ऐसी धातु की बनी घंटियाँ भी यहाँ से प्राप्त हुई हैं। बहुत सी छोटी-छोटी चीजों में यहाँ धर्म चक्र के आकार की बनी पुरोहित के डंडे की मूठ, मुर्गे की मूर्ति तथा मनुष्य की मूर्तियाँ इत्यादि अधिकांशतः मिली है। यहीं पर स्त्री की ठोस मूर्ति, जो कमल पर खड़ी है बहुत ही सुन्दर है। यह कला ईरान की कला से अधिक प्रभावित है क्योंकि ईरान में काँसे से बने बारहसिंघे प्रायः हखमनी काल के मिल चुके हैं तथा काँसे के बरतन भी उसी काल के प्राप्त हुए हैं।

काँसे का बना ई. पू. द्वितीय शताब्दी का एक चीता, जिसके पैर में पहिये लगे हैं, उज्जैन के पास नागदा से भी प्राप्त हआ है। सिद्धार्थ की काँसे की मूर्ति दक्षिण के नागार्जुन कोंडा से खुदाई में प्राप्त हुई है। यह प्रायः ईसा की प्रथम शताब्दी की है। इंग्लिस्तान में सिक्के के भी काँसे के बने जिसमें प्राय: 95% ताँबा, 4% टिन तथा 1% जस्ता है। प्राचीन फीनीशिया के लोगों ने भी काँसे पर बड़ा सुन्दर काम किया है। प्राचीन चीन में काँसे पर अत्यधिक सुन्दर खुदाई के काम को प्रमुखता दी गई। यहाँ पर काँसे के दर्पण, घंटे तथा मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। ईरान में कारीगरों ने काँसे पर खुदाई करके अत्यन्त सुन्दर, मनोहारी बेलबूटे बनाये। पीछे काँसे के बर्तनों पर ईरानियों ने चाँदी से पच्चीकारी करना भी प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार के जो सुन्दर बर्तन प्रायः ईसा की 13वीं और 14वीं शताब्दी के प्राप्त हुए हैं वे दर्शनीय हैं। इनमें ईरान के स्त्री-पुरुषों को बगीचों में क्रीड़ा करते हुए दिखाया गया है। काँसे के जालीदार कटाव के काम की लालटेनें भी अरब में प्रायः ईसा की आठवीं शताब्दी की बनी हुई प्राप्त हुई हैं। अन्य धातुओं के प्राप्त हो जाने पर भी आज काँसे का उपयोग मानव के जीवन में कम नहीं हुआ।

इसके बनाने की विधि में कुछ अन्तर करके वैज्ञानिकों ने विविध प्रकार के काँसे प्रस्तुत किये। आज मूर्ति बनाने के लिए जो काँसा बनता है उसमें 85 प्रतिशत ताँबा, 11 प्रतिशत जस्ता तथा 4 प्रतिशत टिन की मात्रा रहती है। एक दूसरे प्रकार का काँसा, जो विद्युत के तार बनाने के काम आता है उसमें 87 प्रतिशत ताँबा, 9 प्रतिशत टिन तथा 5 प्रतिशत फॉसफोरस की मात्रा होती है। यह साधारण काँसे से कड़ा होता है। आज आभूषण बनाने के लिए एक प्रकार के काँसे का प्रयोग किया जाता है जिसका रंग सुनहरा होता है। इस धातु को ऐल्युमिनियम तथा ताँबा विविध भाग में मिलाकर बनाया जाता है। इस पर खुदाई का काम बड़ा सुन्दर बनता है। जर्मनी में इस प्रकार काँसा बहुत प्रयोग किया गया और वहाँ के बने इस काँसे के आभूषण आजकल यूरोप एवं अमरीका में पहने जा रहे हैं। इस प्रकार काँसा मनुष्य के उपयोग में सभ्यता के प्रारम्भ से लेकर आज तक आता रहा है। भले ही इसका रंग बदल गया हो या इसकी दूसरी उपयोगिता हो गई हो, परन्तु यह मनुष्य का निरन्तर साथी रहा और आगे भी इसका प्रयोग होता रहेगा।

काँसा या कांस्य, किसी ताँबे या ताम्र-मिश्रित धातु मिश्रण को कहा जाता है, प्रायः टिन के संग परन्तु कई बार फासफोरस, मैंगनीज, एल्युमिनियम या सिलिकॉन आदि के साथ भी होते हैं। यह पुरा वस्तुओं में महत्वपूर्ण था, जिसने उस युग को कांस्य युग का नाम दिया। इसे अंग्रेजी में ब्रोज (bronze) कहते हैं, जो कि फारसी मूल का शब्द है जिसका अर्थ कांस्य है। काँसा (संस्कृत कांस्य) संस्कृत कोशों के अनुसार श्वेत ताँबे अथवा घंटा बनाने की धातु को कहते हैं। विशुद्ध ताँबा लाल होता है उसमें राँगा मिलाने पर सफेदी आती है। अतएव ताँबे और राँगे की मिश्र धातु को काँसा या कांस्य कहते हैं। साधारण बातचीत के दौरान कभी-कभी पीतल (Brass) को भी काँसा कह देते हैं। जो ताँबे और जस्ते की मिश्र धातु है और इसका रंगपीला होता है। ताँबे और राँगे की मिश्र धातु को फूल भी कहते हैं। काँसा ताँबे की अपेक्षा अधिक कड़ा होता है और कम ताप (आँच पर पिघलता है। इसलिये काँसा सुविधानुसार ढाला जाता है। 16 भाग ताँबे और 1 भाग राँगे की मिश्र धातु बहुत कड़ी नहीं होती इसे नरम गन मेटल कहते हैं। राँगे का अनुपात दुगुना कर देने पर कड़ा गन मेटल बनता है। 7 भाग ताँबा और 1 भाग राँगा मिलाने पर मिश्र धातु कड़ी, भंगुर और सुस्वर होती है। घटा बनाने के लिए राँगे का अनुपात और बढ़ा दिया जाता है। साधारणतया 3 से 5 भाग तक ताँबे और 1 भाग राँगे की मिश्र धातु इस काम के लिये प्रयुक्त होती है। दर्पण बनाने के लिए लगभग 2 भाग ताँबा और 1 भाग राँगे का प्रयोग किया जाता था परन्तु अब चाँदी की पॉलिश वाले काँच के दर्पणों के आगे इसका प्रचलन इतना प्रयोग में नहीं है। मशीनों के धुरीधरों (bearings) के लिये काँसे का अधिक प्रयोग होता है। क्योंकि घर्षण (friction) कम होता है परन्तु धातु को अधिक कड़ी कर देने के उद्देश्य से उसमें कुछ अन्य धातुयें भी मिलायी जाती हैं। उदाहरण के लिये 24 अथवा अधिक भाग राँगा, 4 भाग ताँबा और 8 भाग ऐंटिमनी प्रसिद्ध 'बैबिट' मेटल है जिसका नाम आविष्कारक आइजक (Issac Babit) पर पड़ा है। इसका धुरीधरों के लिए बहुत प्रयोग है। काँसे में लगभग 1 प्रतिशत फासफोरस मिला देने से मिश्र धातु अधिक कड़ी और चिमड़ी हो जाती है। ऐसी मिश्र धातु को एल्युमिनियम ब्रॉज कहते हैं। यह धातु अधिक मजबूत होती है तथा हवा और पानी में इसका अपक्षरण (खराब) नहीं होता। इतिहास में देखें तो ज्ञात हाता है कि चीनी आलेख का ड्रैगन बना हुआ प्याला (722-481 ई.) में बना प्राप्त हुआ। ईरान से 7वीं शताब्दी में ईवर बनाया गया।

काँसे के गुण - काँसे के बर्तनों का प्रयोग स्वास्थ्य लाभ हेतु किया जाता है। इन बर्तनों का उल्लेख प्राचीन काल से ही मिलता है। ऐसे बर्तन प्राचीन सभ्यताओं से जुड़े स्थलों जैसे ईरान, सुमेर, मिस्र तथा हड़प्पा, मोहन जोदड़ो, लोथल समेत भारत के अन्य जगहों पर मिले हैं। उस समय के बर्तन प्रायः ढालदार व चद्दर को पीटकर बनाये जाते थे। धीरे-धीरे इन पर उभारदार काम भी होने लगा था। भारतीय रसोई में तो काँसे, ताँबे, पीतल और मिट्टी के बर्तन ही मिलते थे। आज भी कांस्य इत्यादि के बर्तनों का उपयोग अच्छा माना जाता है। काँसे के बर्तन जीवाणुओं एवं विषाणुओं को मारने की क्षमता रखते हैं। काँसे के बर्तनों में भोजन करना आरोग्यप्रद, असंक्रमण, रक्त तथा त्वचा रोगों से बचाव करने वाला है। कब्ज और अम्लपित्त की स्थिति में इनमें खाना फायदेमंद होता है। इन पात्रों में खाद्य पदार्थों का सेवन करने से रुचि, बुद्धि, मेधावर्धक और सौभाग्य प्राप्त होता है। यकृत, प्लीहा के रोगों में फायदेमन्द है। प्राचीन काल में निर्माण आयुर्वेद के रस शास्त्र के ग्रन्थों में लगभग 8 भाग ताम्र एवं दो भाग राँगा मिलाकर कांस्य ★ बनाया जाता था। आज भी सामान्यतः 79 प्रतिशत ताम्र एवं 21 फीसदी राँगा मिलाकर कांस्य बनाया जाता है। आयुर्वेद में कांस्य का आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों के अन्तर्गत चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता, अष्टांग हृदय में बर्तन, घंटी, मूर्तियों के साथ रस शास्त्र में औषध के रूप में कांस्य का प्रयोग अधिक होने लगा। कई जगह उल्लेख मिले। आठवीं शताब्दी के पश्चात् तो औषध के रूप में कांस्य का प्रयोग अधिक होने लगा था जो आज भी अनवरत है। रस शास्त्र के आयुर्वेद प्रकाश ग्रन्थ में कांस्य का निर्माण प्रकार, शोधन, गुण तथा औषधि बनाने के विषय में बताया गया है। काँसे के पात्रों का सामाजिक महत्व सामाजिक समुदायों में अधिक है। विवाह के शुभ अवसरों में आज भी कन्या पक्ष की तरफ से वर पक्ष को कांस्य के पात्र में धन, धान्य इत्यादि भरकर सम्मानपूर्वक भेंट किया जाता है। ऐसे अवसरों पर काँसे के कटोरे, थाली, गिलास भेंट करना शुभ माना जाता है। कंसारा का अच्छा कदम आम लोगों की अपनी परम्परा, संस्कृति से जोड़ने और कांस्य के फायदे को आम लोगों तक पहुँचाने का कार्य किया। इसमें कंसारा मेटलैक्स ने पीढ़ियों से हासिल ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर कांस्य से जुड़े बर्तनों की श्रृंखला, मन्दिर की घंटी और काँसे के उपहार बाजार में उतारकर इन्हें महत्ता प्रदान की। कांस्य के गुण चिकित्सा के रूप में कांस्य भस्म हल्की, उष्ण तथा शरीर की बसा को कम करने वाली मानी गई है। कांस्य का महत्व धार्मिक कार्य की ओर प्राचीन काल से रहा है। मन्दिर की घंटियों एवं बड़े-बड़े कांस्य से बनाये जाते थे। कांस्य ऐसी धातु है जिसकी आवाज मृदु, स्निग्ध और तेज स्वर में निकलती है इसे सुनने से मन में शांति एवं प्रसन्नता महसूस होती है। काँसे के पात्रों का प्रयोग धार्मिक कार्यों के लिये शुभ माना जाता है।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तिकला के विषय में आप क्या जानते हैं?
  2. प्रश्न- कांस्य कला (Bronze Art) के विषय में आप क्या जानते हैं? बताइये।
  3. प्रश्न- कांस्य मूर्तिकला के विषय में बताइये। इसका उपयोग मूर्तियों एवं अन्य पात्रों में किस प्रकार किया गया है?
  4. प्रश्न- कांस्य की भौगोलिक विभाजन के आधार पर क्या विशेषतायें हैं?
  5. प्रश्न- पूर्व मौर्यकालीन कला अवशेष के विषय में आप क्या जानते हैं?
  6. प्रश्न- भारतीय मूर्तिशिल्प की पूर्व पीठिका बताइये?
  7. प्रश्न- शुंग काल के विषय में बताइये।
  8. प्रश्न- शुंग-सातवाहन काल क्यों प्रसिद्ध है? इसके अन्तर्गत साँची का स्तूप के विषय में आप क्या जानते हैं?
  9. प्रश्न- शुंगकालीन मूर्तिकला का प्रमुख केन्द्र भरहुत के विषय में आप क्या जानते हैं?
  10. प्रश्न- अमरावती स्तूप के विषय में आप क्या जानते हैं? उल्लेख कीजिए।
  11. प्रश्न- इक्ष्वाकु युगीन कला के अन्तर्गत नागार्जुन कोंडा का स्तूप के विषय में बताइए।
  12. प्रश्न- कुषाण काल में कलागत शैली पर प्रकाश डालिये।
  13. प्रश्न- कुषाण मूर्तिकला का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  14. प्रश्न- कुषाण कालीन सूर्य प्रतिमा पर प्रकाश डालिये।
  15. प्रश्न- गान्धार शैली के विषय में आप क्या जानते हैं?
  16. प्रश्न- मथुरा शैली या स्थापत्य कला किसे कहते हैं?
  17. प्रश्न- गांधार कला के विभिन्न पक्षों की विवेचना कीजिए।
  18. प्रश्न- मथुरा कला शैली पर प्रकाश डालिए।
  19. प्रश्न- गांधार कला एवं मथुरा कला शैली की विभिन्नताओं पर एक विस्तृत लेख लिखिये।
  20. प्रश्न- मथुरा कला शैली की विषय वस्तु पर टिप्पणी लिखिये।
  21. प्रश्न- मथुरा कला शैली की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  22. प्रश्न- मथुरा कला शैली में निर्मित शिव मूर्तियों पर टिप्पणी लिखिए।
  23. प्रश्न- गांधार कला पर टिप्पणी लिखिए।
  24. प्रश्न- गांधार कला शैली के मुख्य लक्षण बताइये।
  25. प्रश्न- गांधार कला शैली के वर्ण विषय पर टिप्पणी लिखिए।
  26. प्रश्न- गुप्त काल का परिचय दीजिए।
  27. प्रश्न- "गुप्तकालीन कला को भारत का स्वर्ण युग कहा गया है।" इस कथन की पुष्टि कीजिए।
  28. प्रश्न- अजन्ता की खोज कब और किस प्रकार हुई? इसकी प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख करिये।
  29. प्रश्न- भारतीय कला में मुद्राओं का क्या महत्व है?
  30. प्रश्न- भारतीय कला में चित्रित बुद्ध का रूप एवं बौद्ध मत के विषय में अपने विचार दीजिए।
  31. प्रश्न- मध्यकालीन, सी. 600 विषय पर प्रकाश डालिए।
  32. प्रश्न- यक्ष और यक्षणी प्रतिमाओं के विषय में आप क्या जानते हैं? बताइये।

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